भारत की विदेश नीति में जैसा बिखराव है, उस वजह से भारत का प्रभाव विश्व में कम हो रहा है। यह सबके लिए दुख की बात है।
- ಚುನಾವಣೆಯಲ್ಲಿ ಸೋಲುವ ಭಯದಿಂದ ಸಾಂವಿಧಾನಿಕ ಸಂಸ್ಥೆಗಳ ಮೇಲೆ ಅನುಮಾನ: ಆರ್.ಅಶೋಕ
- ಗಮನ ಬೇರೆಡೆ ಸೆಳೆದು ಮತದಾರರ ಹಕ್ಕುಗಳನ್ನು ಕಸಿದುಕೊಳ್ಳುವ ಪ್ರಯತ್ನ: ಪ್ರಕಾಶ್ ರಾಜ್
- ಪ್ರಜಾಪ್ರಭುತ್ವದಲ್ಲಿ ಪ್ರಧಾನಿಯೂ ವ್ಯಂಗ್ಯಕ್ಕೆ ಅತೀತರಲ್ಲ
- ಹಾಲಿನ ದರ ಏರಿಕೆ ಕುರಿತು ಸಂಪುಟದಲ್ಲಿ ಚರ್ಚಿಸಿ ತೀರ್ಮಾನ: ಡಿ ಕೆ ಶಿವಕುಮಾರ್
- ಒಂದು ತಿಂಗಳ ಸಂಬಳವನ್ನು ಬರ ಪರಿಹಾರ ನಿಧಿಗೆ ನೀಡಿ
भारत देश ने गुटनिरपेक्ष आंदोलन का नेतृत्व किया।
• दुनिया के जिन देशों और महाद्वीपों में आज़ादी के लिए, रंगभेद के खिलाफ बड़े संघर्ष हुए, उन्होंने भारत की अगुवाई को माना, भारत की आवाज़ को सुना- चाहे वह अफ्रीका हो, लैटिन अमेरिका हो या एशिया के देश हों।
• 50 के दशक में जब कोरिया का crisis हुआ था, तब दुनिया ने समाधान के लिए भारत की तरफ देखा था। यह एक ऐतिहासिक सत्य है कि हर चुनौती के समय विश्व, भारतवर्ष की आवाज़ सुनता था, क्योंकि हमारे पास सबसे बड़ी शक्ति हमारी नैतिकता थी और मानवता की आवाज़ थी, लेकिन आज ये दोनों कम हुई हैं।
• जब हम राष्ट्रहित को आगे रखते हैं, तो उसके पीछे एक आम सहमति देश की रहती है, लेकिन मौजूदा सरकार में ये नहीं दिखता। राष्ट्रहित में हमारी कूटनीति और विदेश नीति से जुड़े मुद्दों पर एकतरफा फैसले लेने पर रोक लगनी चाहिए।
• इस विषय पर सरकार को विचार कर आत्मनिरीक्षण करना चाहिए। वास्तविकता को स्वीकार करें और जो देश के बड़े दल हैं, उनके नेताओं के साथ बैठकर भी विचार-विमर्श करें।
हम यह समझते हैं कि आने वाले संसद सत्र में विदेश नीति और देश की समस्याओं, चुनौतियां पर व्यापक चर्चा हो।
– Anand Sharma, राज्य सभा सांसद




