जब राज्यसभा के सभापति रहे जगदीप धनखड़ जी ने कानून मंत्री से पूछा कि दूसरा Motion लोकसभा में move हुआ या नहीं, तब मंत्री मेघवाल ने ‘हां’ में जवाब दिया था।
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लेकिन कल एक पूर्व कानून मंत्री ज्ञान दे रहे थे कि कोई motion राज्यसभा में एडमिट ही नहीं हुआ।
• अगर ऐसा है तो राज्यसभा सभापति को इतना बड़ा वक्तव्य देने की जरूरत क्या थी? उन्होंने कानून मंत्री से क्यों पूछा कि दूसरा Motion लोकसभा में move हुआ या नहीं।
• ऐसे में- मैं जानना चाहता हूं कि यह सब जो धनखड़ साहब बोल रहे थे, वह किसलिए हो रहा था?
• जब वह कह रहे थे कि मेरे पास राज्यसभा में वैसा motion आ गया है, जो कानून के तथ्यों को संतुष्ट करता है। साथ ही, कानून मंत्री ने भी लोकसभा में motion के move होने की बात मान रहे थे तो फिर — admission of motion के लिए क्या बचता है — मैं जानना चाहता हूं?
अब इस सबके मायने क्या हैं, ये समझिए?
पहला: अगर दोनों सदनों में एक ही दिन motion होगा तो दोनों सदन के अध्यक्ष मिलकर statutory committee of enquiry बनाएंगे। दोनों सदन समन्वय, सहयोग, स्पष्टता और सामंजस्य के साथ एक साथ काम करेंगे।
दूसरा: ये सब होने के कुछ समय बाद जगदीप धनखड़ जी इस्तीफा दे देते हैं और उस वक्त रिजिजू जी या मेघवाल जी ऐसा कुछ नहीं कहते कि ऐसा motion ही नहीं था। इस सबके बीच सवाल उठता है कि इतना बड़ा वक्तव्य देकर, कानून मंत्री से पूछकर, अगर motion एडमिट भी नहीं हुआ तो क्या कोई shadow boxing कर रहा था?
तीसरा: ये सब मोदी सरकार की असुरक्षा को दिखाता है। इन्हें बस किसी तरह शर्मिंदगी से बचना है। इससे ये भी मालूम पड़ता है कि इनका संवैधानिक प्रक्रिया, न्यायिक जवाबदेही और एंटी करप्शन मूवमेंट से कोई संबंध नहीं है।
चौथा: हम सब जानते हैं कि इस बारे में कांग्रेस ने पहल की, तब BJP को लगा कि हम किनारे पर खड़े हैं। इस पूरी प्रक्रिया को अपने काबू में करने के लिए उन्होंने सोचा कि motion को निरस्त करो, उपराष्ट्रपति को भी निरस्त करो। ऐसे में सवाल है – यह किस प्रकार की सरकार है? यह किस प्रकार की approach है?
पांचवा: BJP सरकार को चिंता इस बात की नहीं है कि जो प्रावधान है, वह कितना उदार है। इनको चिंता यह थी कि focus किसने ले लिया — who stole the mark, who stole the show?
यह दिखाता है कि ये कितना छिछला और उथला है।
– Abhishek Manu Singhvi, Senior Congress Leader




